خيرالزاد

خيرالزاد – ٩٣٤

متـى  يحول  بين  المرء  وقلبه  ؟

 

متـى  يحول  بين  المرء  وقلبه  ؟

  1. إن الله  عز  وجل  يدعو  المؤمن  للحياة  الحقة  (  يا  أيها  الذين  آمنوا  استجيبوا  للهِ  وللرسولِ  إذا  دعاكم  لِما  يُحييكم  )  .
  2. إنّ هناك  تصرفاً  إلهياً  في  قلوب  بعض  العباد  ،  ينجيهم  به  الله  عز  وجل  بلطفٍ  منه  إلى  جادة  الحق  (  واعلموا  أنّ  الله  يحول  بين  المرءِ  وقلبه  وأنّه  إليه  تُحشرون  )  .
  3. إن هناك  من  العباد  من  أهملهم  الحق  المتعال  من  عنايته  ووكلهم  إلى  أنفسهم  فلا  يفلحون  أبداً  ،  ولذا  من  المناسب  أن  يدعو  المؤمن  بدعاء  النبي  الأكرم  (صلى الله عليه وآله):  (  اللهم  لا  تكلني  إلى  نفسي  طرفة  عينٍ  أبدا  )    .
  4. إن البعض  قد  يشتهي  الحرام  ،  ويقدر  عليه  ،  ولكنه  يرى  مانعاً  وانزجاراً  نفسياً  في  لحظة  الميل  للحرام    ،  إن  هذا  الصد  وإنزجار  النفس  عن  الحرام  لهو  لطف  إلهي  ببعض  العباد  ،  وياله  من  لطف  منقذ  !.
  5. إن الإمام  الصادق  (عليه السلام)  فسّر  لنا  قوله  تعالى  {  واعلموا  أن  الله  يحول  بين  المرء  وقلبه  }  :  (هو  أن  يشتهي  الشيء  بسمعه  وبصره  ولسانه  ويده  ،  أمَا  إنّه  لا  يغشى  شيئاً  منها  ،  وإن  كان  يشتهيه  فإنه  لا  يأتيه  إلاّ  وقلبه  مُنكِر،  لا  يقبل  الذي  يأتي  ،  يعرف  أنّ  الحقّ  ليس  فيه  )  .
  6. إن البعض  يضعف  أمام  الغيبة  القاهرة  ،  ولولا  التسديد  الإلهي  لتفوه  بما  يوبقه  ،  سيما  وأن  الغيبة  لا  تحل  إلا  في  موارد  خصصها  الشارع  كرفع  الظلامة  أمام  القاضي  .
  7. قد تتاح  المعصية  للبعض  مع  رغبة  باطنية  ،  ولكنه  يلقن  نفسه  ازدراء  المعصية  ،  فشتان  بين  عمل  تذهب  لذته  وتبقى  تبعته  ،  وعمل  تذهب  مؤنته  ويبقى  أجره  .
  8. إن التسديد  وصلاح  القلب  وعمارته  ،  أمر  متاح  لكل  من  يخالط  أهل  الخير  ،  وهذا  التوجيه  نجده  واضحاً  في  عبارة  أمير  المؤمنين  (عليه السلام)  (  لقاء  أهل  الخير  عمارة  القلب  ).

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